नमाज़

हर मुसलमान मर्द और औरत को यह जान लेना चाहिए कि ईमान और अक़ीदों को सहीह कर लेने के बाद सब फर्ज़ों में सबसे बड़ा फर्ज़ नमाज़ है क्योंकि कुअराने मजीद और हदीसों में बहुत ज्यादह बार-बार इसकी ताकीद आई है याद रखें कि जो नमाज़ को फर्ज़ न माने या नमाज़ की तौहीन करे या नमाज़ को एक हल्की और बे-क़दर चीज़ समझ कर इस की तरफ से बेतवज्जही बरते वह काफ़िर और इस्लाम से ख़ारिज है। और जो शख़्स (आदमी) नमाज़ न पढ़े वह बड़ा गुनहगार, ग़ज़बे जब्बार में गिरफ्तार और अज़ाबे जहन्नम का हक़दार है। और वह इस लाएक है कि बादशाहे इसलाम पहले उसको तंबीह व सज़ा दे फिर भी वह नमाज़ न पढ़े तो इसको क़ैद कर दे यहाँ तक कि तौबा करे और नमाज़ पढ़ने लगे बल्कि इमाम मालिक व शाफ़ई व अहमद् रहमतुल्लाह अलैहिम के नज़दीक बादशाहे इस्लाम को उसके क़त्ल का हुक्म है। (दुर्रे मुख्तार, रद्दल मुख्तार)

मसअलह- जब बच्चा सात बरस का हो जाये तो उसको नमाज़ सिखा कर नमाज़ पढ़ने का हुक्म दें। और जब बच्चे की उम्र दस बरस की हो जाए तो मार-मार कर उसे नमाज़ पढ़वायें

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